मनहूस कौन चेहरा या हमारी सोच




                                          मनहूस कौन?



 लेखक:-  राकेश कुमार        मेरी  मुख्य वेबसाइट और पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें या बैक जाएं

एक राज्य था…और उस राज्य का एक राजा। एक दिन राजा को पता चला—

उसके ही राज्य में एक मनहूस आदमी रहता है।

कहते थे…अगर सुबहसुबह उसका चेहरा देख लिया जाए,तो दिन भर भोजन तक नसीब नहीं होता था।

राजा को ग़ुस्सा आ गया कि उसके राज्य में ऐसा मनहूस आदमी है।

उसने आदेश दिया और  उस आदमी को दरबार में बुलवाया और आदेश दिया—

“आज रात तुम मेरे कक्ष में सोओगे,

और सुबह सबसे पहले मैं तुम्हारा चेहरा देखूँगा।”

रात को वो व्यक्ति राजा के कमरे में सो गया जैसे तैसे रात बीती…

सुबह हुई…राजा ने आँख खोली और उस आदमी का चेहरा देखा। और

राजा उठकर राज्य के कामों में लग गया। सभा, फ़ैसले, युद्ध की तैयारियाँ…काम पर काम आते गए ।

दिन ढल गया…शाम होने को आ गई लेकिन राजा को खाने का समय ही नहीं मिला।

शाम होते-होते राजा भड़क उठा—“ये सब तेरी वजह से हुआ!”और क्रोध में आकर

उस आदमी को मृत्युदंड सुना दिया।मरने से पहले राजा ने पूछा—

“तुम्हारी आख़िरी इच्छा ?”वह आदमी मुस्कराया और बोला—

“महाराज…आपने सुबह मेरा चेहरा देखा, आपको दिन भर खाना नहीं मिला।

लेकिन मैंने तोपूरा दिन आपका चेहरा देखा है…

फिर भीमृत्युदंड मुझे मिला है।”राजा स्तब्ध रह गया…और सच्चाई सामने आ गई।

👉 बुरा कोई और नहीं,

हमारी सोच ही मनहूस होती है।

 

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बुरा जो खोजन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

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